Friday, December 3, 2010

सूरदास

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कृष्ण भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में सूरदास का नाम सर्वोपरि है। हिन्दी साहित्य में भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदासहिंदी साहित्य के सूर्य माने जाते हैं। हिंदी कविता कामिनी के इस कमनीय कांत ने हिंदी भाषा को समृद्ध करने में जो योगदान दिया है, वह अद्वितीय है। सूरदास हिन्दी साहित्य में भक्ति काल के सगुण भक्ति शाखा के कृष्ण-भक्ति उपशाखा के महान कवि हैं। हिन्ढी साहित्य में कृष्ण-भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में महाकवि सूरदास का नाम अग्रणी है।

कबीर दास

कबीर दास
बीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे। ये सिकन्दर लोदी के समकालीन थे। कबीर का अर्थ अरबी भाषा में महान होता है। कबीरदास भारत के भक्ति काव्य परंपरा के महानतम कवियों में से एक थे। भारत में धर्म, भाषा या संस्कृति किसी की भी चर्चा बिना कबीर की चर्चा के अधूरी ही रहेगी। कबीरपंथी, एक धार्मिक समुदाय जो कबीर के सिद्धांतों और शिक्षाओं को अपने जीवन शैली का आधार मानते हैं,

Wednesday, November 24, 2010

तुलसीदास


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गोस्वामी तुलसीदास [१४९७ (१५३२?) - १६२३] एक महान कवि थे। उनका जन्म राजापुर, (वर्तमान बाँदा जिला) उत्तर प्रदेश में हुआ था। अपने जीवनकाल में तुलसीदासजी ने १२ ग्रन्थ लिखे और उन्हें संस्कृत विद्वान होने के साथ ही हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ट कवियों में एक माना जाता है। तुलसीदासजी को महर्षि वाल्मीकि का भी अवतार माना जाता है जो मूल आदि काव्य रामायण के रचयिता थे। श्रीरामजी को समर्पित ग्रन्थ श्री राम चरित मानस वाल्मीकि रामायण का प्रकारांतर से अवधी भाषांतर था जिसे समस्त उत्तर भारत में बड़े भक्तिभाव से पढ़ा जाता है। इसके बाद विनय पत्रिका तुलसीदासकृत एक अन्य महत्त्वपूर्ण काव्य है।

Monday, November 22, 2010

आओ पहॆलियाँ दॆखो

1. तुम न बुलाओ मैं आ जाऊँगी,
न भाड़ा न किराया दूँगी,
घर के हर कमरे में रहूँगी,
पकड़ न मुझको तुम पाओगे,
मेरे बिन तुम न रह पाओगे,
बताओ मैं कौन हूँ?

2. गर्मी में तुम मुझको खाते,
मुझको पीना हरदम चाहते,
मुझसे प्यार बहुत करते हो,
पर भाप बनूँ तो डरते भी हो।

3. मुझमें भार सदा ही रहता,
जगह घेरना मुझको आता,
हर वस्तु से गहरा रिश्ता,
हर जगह मैं पाया जाता

4. ऊपर से नीचे बहता हूँ,
हर बर्तन को अपनाता हूँ,
देखो मुझको गिरा न देना
वरना कठिन हो जाएगा भरना।

5. लोहा खींचू ऐसी ताकत है,
पर रबड़ मुझे हराता है,
खोई सूई मैं पा लेता हूँ,
मेरा खेल निराला है।

उत्तर : 1. हवा 2. पानी 3. गैस 4.द्रव्य 5. चुंबक 6. काँच

Tuesday, November 16, 2010

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मुंशी प्रेमचन्द

जीवन परिचय


प्रेमचंद का जन्म ३१ जुलाई १८८० को वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी था तथा पिता मुंशी अजायबराय लमही में डाकमुंशी थे।[४] उनकी शिक्षा का आरंभ उर्दू, फारसी से हुआ और जीवन यापन का अध्यापन से। १८९८ में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए। नौकरी के साथ ही उन्होंने पढ़ाई जारी रखी १९१० में इंटर पास किया और १९१९ में बी.ए.[५] पास करने के बाद स्कूलों के डिप्टी सब-इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए। सात वर्ष की अवस्था में उनकी माता तथा चौदह वर्ष की अवस्था में पिता का देहान्त हो जाने के कारण उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षमय रहा।[६] उनका पहला विवाह उन दिनों की परंपरा के अनुसार पंद्रह साल की उम्र में हुआ जो सफल नहीं रहा। वे आर्य समाज से प्रभावित रहे[७], जो उस समय का बहुत बड़ा धार्मिक और सामाजिक आंदोलन था। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन किया और १९०६ में दूसरा विवाह अपनी प्रगतिशील परंपरा के अनुरूप बाल-विधवा शिवरानी देवी से किया।[८] उनकी तीन संताने हुईं- श्रीपत राय, अमृतराय और कमला देवी श्रीवास्तव। १९१० में उनकी रचना सोजे-वतन (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया। सोजे-वतन की सभी प्रतियां जब्त कर नष्ट कर दी गई। कलेक्टर ने नवाबराय को हिदायत दी कि अब वे कुछ भी नहीं लिखेंगे, यदि लिखा तो जेल भेज दिया जाएगा। इस समय तक प्रेमचंद ,धनपत राय नाम से लिखते थे। उर्दू में प्रकाशित होने वाली ज़माना पत्रिका के सम्पादक मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद वे प्रेमचन्द के नाम से लिखने लगे। जीवन के अंतिम दिनों में वे गंभीर रुप से बीमार पड़े। उनका उपन्यास मंगलसूत्र पूरा नहीं हो सका और लंबी बीमारी के बाद ८ अक्टूबर १९३६ को उनका निधन हो गया।

पढें प्रेमचन्द का गोदान उपन्याम का अंश

पाँव तले दबी गर्दन : --
गोदान
मुख्यपात्र परिचय
होरी – बेलारी गाँव का किसान
धनिया – होरी की पत्नी
गोबर – होरी का पुत्र
भोला - दूसरे गाँव का बूढा किसान
झुनिया - भोला की विधवा पुत्री
रायसाहब अमरपाल सिंह - बेलारी गाँव का ज़मीन्दार
हीरा और शोभा - होरी के भाई
पुनिया - हीरा की पत्नी
नोहरी - भोला की दूसरी पत्नी
कामता और जंगी - भोला के पुत्र


होरी की कहानी - पत्नी धनिया, पुत्र गोबर। होरी किसान की एकमात्र अभिलाषा थी कि उसके घर के सामने गाय बाँधना। वह गाँव के ज़मीन्दार रायसाहब के यहाँ अक्सर जाया करता था। भोला दूसरे गाँव का बूढा किसान आकर ज़मीन्दार जी से गाय ले गया। रास्ते में होरी ने उसे देख लिया और भूसा देकर कुछ दिन के लिए वह गाय अपने घर ले गया। हीरा और मोती, होरी के भाई थे पर उनके बीच की संबंध ठीक नहीं थी। हीरा ने गाय को ज़हर देकर मार डाला। पुलीस के भय में हीरा गाँव से भाग गया।
गोबर और भोला की विधवा पुत्री झुनिया प्रेमबद्ध हो गये। कुछ दिन बीत जाने पर झुनिया गर्भवति हो गयी। गोबर झुनिया को अपने घर में शरण दिया और गाँववालों की डर से गाँव छोडकर भाग गया। अब झुनिया का संरक्षण होरी के कंधों पर आ गया।
भोला गाय वापस लेने आया। इधर झुनिया को होरी ने शरण दे रखा था, यह देखकर भोला गाय वापस माँगने लगा तो होरी ने अपने दोनों बैल भोला को दे दिया। बैल के नष्ट हो जाने पर होरी किसान न रहा था। उसको दूसरों के खेतों में काम करना पडा। वह गाँव में कंकड की खुदाई करने लग। होरी का स्वास्थ्य बुरी हो गयी थी। फिर भी वह काम करता रहा। कुछ दिन बाद गोबर वापस आ गया। उसने भोला से अपने बैल वापस ले आया पर होरी इसे स्वीकारने के लिए तैयार न हुआ। गोबर झुनिया को लेकर चला गया। कुछ दिन बाद हीरा वापस आया और होरी से क्षमा माँगा।
अब होरी संतोषवान था। जीवन के सारे संकट, सारी परेशानियाँ, सारी निराशाएँ मानो उसके पैरों पर लेट रही थी। पर ईश्वर का निश्च्य तो अंतिम होता है - होरी की मृत्यु हो गयी। गाँववाले गोदान के लिए धनिया से बोले तो वह मूर्छित होकर गिर पडी।

Thursday, October 14, 2010

स्वागत


प्रिय मित्रॊं सबको इस ब्लोग को स्वागत.......
भारतीयॊं के राष्ट्रीय भाषा हिन्दी है ।इस दुनिया में अंग्रेसी और चैनीस के बाद सबसे अधिक लोग दिन भर उपयोग करना भाषा हमारा हिन्दी है ।इस ब्लोग में मैं हिन्दी के भारे में कुछ विञान देनेवाले कार्यों और साहित्य सृष्टियॊं आपको परिचित करता है ।